Sunday, October 23, 2005

परिचय








सन्तोष कुमार सिंह

जन्म- 8 जून 1951
सम्प्रति- इंडियन आयल कारपोरेशन लि. मथुरा रिफाइनरी में उत्पादन अभियन्ता पद पर कार्यरत।
लेखन-
बाल कविताएँ, गीत, ग़जल, निबन्ध, व्यंग्य कविताएँ, हाइकु कविताएँ तथा कहानियाँ।
प्रसारण-
आकाशवाणी मथुरा से कविताओं का प्रसारण।
प्रकाशन-
* परमवीर प्रताप (खण्ड-काव्य)
* सुन रे मीत नारी के गीत (गीत संकलन)
* पेड़ का दर्द (पर्यावरण शिक्षा बाल गीत)
* आलोक स्मृति (शोक काव्य)
* पर्यावरण की कहानी दादा जी की जुबानी (बाल कहानी)
* हाथी गया स्कूल (बाल गीत)
* बन्दर का अदृभुत न्याय (बाल गीत)
* आस्था के दीप (हाइकु-संग्रह)
* आईना सच कहे (हाइकु-संग्रह)
* अछूता कन्या (कहानी-संग्रह)
* नीति शतक काव्यानुवाद
* कथा द्वादश ज्योर्तिलिंग
सम्पादन व सहयोग-
* मथुरा रिफाइनरी न्यूज जनरल
* राजभाषा मासिका पत्रिका
* कल्पवृक्ष
* ब्रजांगना
सम्मान व पुरस्कार-
* कवि सभा दिल्ली से 'कवि श्री' सम्मान।
* पं.रामनारायण शास्त्री 'कहानी पुरस्कार' इन्दौर से।
* इंडियन आयल मुख्यालय दिल्ली से निबन्ध पर अखिल भारतीय स्तर पर पुरस्कार।
* अनेक निबन्ध पुरस्कृत
सम्पर्क-
'चित्रनिकेतन', मोतीकुंज एक्सटेन्शन
मथुरा- 281001 (उ॰प्र॰)
फोन- 0565-2432284
मोबाइल- 9412492636
e-mail- kumar_santosh@iocl.co.in

Friday, October 21, 2005

22 - हाइकु कविताएँ

बुझने लगे
ईर्ष्या भरी हवा से
आस्था के दीप।
***



कोई गरीब
जब सिर उठाता
भूकम्प आता।
***



सो गया आप
पेट भर कुत्ते का
भूखा था बाप।
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थाने में पीटा
था कसूर इतना
बेकसूर था।
***




साड़ी को खींचा
सभी चुप हो गए
भीष्म थे सब।
***





आया बसंत
बिहँस उठे भृंग
सुनायें छंद।
***





दलाली खुली
राजनीति की कुर्सी
पृथ्वी-सी हिली।
***





दु:खी हो गात
अमावस-सी लगे
चॉंदनी रात।
***





सबको पता
पीले पात-से अब
हैं मेरे पिता।
***




है तीव्र ज्वाला
फिर किसने रवि
सांचे में ढाला।
***





नाम है गुलाब
कांटा बन जिए
वे तो जनाव।
***





रंभती रही
कसाइयों के घर
गाय-सी बहू।
***





काटा जो नींम
वृक्ष नहीं बाबरे
मारा हकीम।
***





पेड़ है कटा
रो रही लिपट के
तन से लता।
***






दुष्टों के साथ
कमल की तरह
मैं रहा साफ।
***





जब भी मिले
स्वार्थ की कीचड़ में
सने ही मिले।
***






कर लो शोध
स्वर्ग से बढ़कर
है,मॉं की गोद।
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नैनों ने कहा
पिताजी ने समझा
मॉं तो चुप थी।
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सोचें सिलायें
अहल्या-सी तरेंगीं
राम तो आयें।
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थरथराया
रेल के पुल जैसा
कई बार मैं।
***





अति का सब्र
लाश लिए गोदी में
बैठी हैं कब्र।
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हर युद्ध में
जीते कोई भी पक्ष
हारे इंसान।
***

-सन्तोष कुमार सिंह

20 हाइकु कविताएँ

ले पिचकारी
प्रकृति ने रॅंग दीं
तितली सारी।
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तितली व्यस्त
बदल नहीं पाई
होली के वस्त्र।
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माँगती अब
ये जहरीली हवा
खुद को दवा।
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शिव हैं वृक्ष
प्रदूषण का विष
पीते हैं नित्य।
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कैसे ये फूल
गले ही पड़ गए
भद्र जनों के।
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भूकम्प आया
देखता रहा व्योम
प्राणों का होम।
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धरती हिले
अकेले ही मगर
दिल लाखों में।
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बहिन-भाई
भूकम्प औ सुनामी
दोनों कसाई।
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बूँद ही नहीं
मानव भी बनता
गुणों से मोती।
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खाओ रे खौप
एड्स है भयानक
साक्षात मौत।
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भले व चंगे
पशु-पक्षी सहिष्णु
कफ्र्यू न दंगे।
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बलवान था
शेर नहीं खा पाया
चिन्ता ने खाया।
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निशा है रोती
पत्तों पर बिखेरे
दु:ख के मोती।
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सूखती रहीं
फूलों के बिछोह में
डालियाँ वहीं।
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विधवा हुई
फूल जैसी जिन्दगी
पहाड़ हुई।
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सृष्टि की चूक
प्राणियों को दे गई
निकम्मी भूख।
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काँटों के बीच
फूलों की तरह ही
मुस्काना सीख।
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धुआँ विषैला
रोज करे नभ का
आंचल मैला।
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भागा अँधेरा
दीपक ने उखाड़ा
तम का डेरा।
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हो गई हद
कानून से ऊपर
उनका कद।
***

-सन्तोष कुमार सिंह

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